"फलक से,
चाँद सितारे तोड़ने के लिये,
हाथ हमने भी बढ़ाये थे
पर
एक पल के लिये,
ठिठककर रह गये हम,
"ये" तो वही अपने है
जो
जहां से चले गये,
हमें रोशनी देने के लिये...."
इस 'खुबसूरत सृष्टि' की एक रचना हूँ मैं | मेरा नाम इंदु आचार्य है और अदना सा शौक है अपने विचारों को कागज़ पर उतरने का | मैंने अपने लेखन में प्रकृति, जीवन के रूपों, भावनाओं को समेटने की कोशिश की है | आपको कहीं प्यारभरी सौगातें देखने को मिलेंगी तो कहीं दर्दभरी दास्ताँ | मैं अपने विचार, अपनी सोच, अपने तरीके से आपके समक्ष रख रहीं हूँ | आशा है, आपको मेरी लेखनी पसंद आयेगी |
Sunday, 2 December 2018
फलक
रंग दुनिया का
"सबको
समझाते समझाते,
अब हमें भी
रूठना आ गया....
सच की गुहार
लगाते लगाते,
मीठा झूठ
बोलना आ गया....
ईमानदारी की हार में भी,
तसल्ली थी जहाँ,
आज
चालबाजी के हुनर से,
जग को
जीतना आ गया....
कभी थे मरहम
सबके लिये हम,
मेहरबानी रही
जालिम जमाने की,
हमें भी घावों को
कुरेदना आ गया...."
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