Sunday, 2 December 2018

रंग दुनिया का

"सबको
समझाते समझाते,
अब हमें भी
रूठना आ गया....
सच की गुहार
लगाते लगाते,
मीठा झूठ
बोलना आ गया....
ईमानदारी की हार में भी,
तसल्ली थी जहाँ,
आज
चालबाजी के हुनर से,
जग को
जीतना आ गया....
कभी थे मरहम
सबके लिये हम,
मेहरबानी रही
जालिम जमाने की,
हमें भी घावों को
कुरेदना आ गया...."

8 comments:

  1. Replies
    1. मैं तुमसे बेहतर लिखता हूँ ,
      पर जज्बात तुम्हारे अच्छे हैं !

      मैं तुमसे बेहतर दिखता हूँ ,
      पर अदा तुम्हारी अच्छी हैं !

      मैं खुश हरदम रहता हूँ ,
      पर मुस्कान तुम्हारी अच्छी हैं !

      मैं अपने उसूलों पर चलता हूँ ,
      पर ज़िद तुम्हारी अच्छी हैं !

      मैं एक बेहतर शख्सियत हूँ ,
      पर सीरत तुम्हारी अच्छी हैं !

      मैं आसमान की चाह रखता हूँ,
      पर उड़ानें तुम्हारी अच्छी हैं !

      मैं तुमसे बहुत बहस करता हूँ ,
      पर दलीलें तुम्हारी अच्छी हैं !

      मैं तुमसे बेहतर गाता हूँ ,
      पर धुन तुम्हारी अच्छी हैं !

      मैं कितना भी कुछ कहता रहूँ ,
      पर हर बात तुम्हारी अच्छी हैं !

      Delete
    2. मैं तुमसे बेहतर लिखता हूँ ,
      पर जज्बात तुम्हारे अच्छे हैं !

      मैं तुमसे बेहतर दिखता हूँ ,
      पर अदा तुम्हारी अच्छी हैं !

      मैं खुश हरदम रहता हूँ ,
      पर मुस्कान तुम्हारी अच्छी हैं !

      मैं अपने उसूलों पर चलता हूँ ,
      पर ज़िद तुम्हारी अच्छी हैं !

      मैं एक बेहतर शख्सियत हूँ ,
      पर सीरत तुम्हारी अच्छी हैं !

      मैं आसमान की चाह रखता हूँ,
      पर उड़ानें तुम्हारी अच्छी हैं !

      मैं तुमसे बहुत बहस करता हूँ ,
      पर दलीलें तुम्हारी अच्छी हैं !

      मैं तुमसे बेहतर गाता हूँ ,
      पर धुन तुम्हारी अच्छी हैं !

      मैं कितना भी कुछ कहता रहूँ ,
      पर हर बात तुम्हारी अच्छी हैं !

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  2. सत्य कहा इंदु दीदी आपने जमाने के साथ धीरे धीरे चलना ही पड़ता है

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