"सबको
समझाते समझाते,
अब हमें भी
रूठना आ गया....
सच की गुहार
लगाते लगाते,
मीठा झूठ
बोलना आ गया....
ईमानदारी की हार में भी,
तसल्ली थी जहाँ,
आज
चालबाजी के हुनर से,
जग को
जीतना आ गया....
कभी थे मरहम
सबके लिये हम,
मेहरबानी रही
जालिम जमाने की,
हमें भी घावों को
कुरेदना आ गया...."
इस 'खुबसूरत सृष्टि' की एक रचना हूँ मैं | मेरा नाम इंदु आचार्य है और अदना सा शौक है अपने विचारों को कागज़ पर उतरने का | मैंने अपने लेखन में प्रकृति, जीवन के रूपों, भावनाओं को समेटने की कोशिश की है | आपको कहीं प्यारभरी सौगातें देखने को मिलेंगी तो कहीं दर्दभरी दास्ताँ | मैं अपने विचार, अपनी सोच, अपने तरीके से आपके समक्ष रख रहीं हूँ | आशा है, आपको मेरी लेखनी पसंद आयेगी |
Sunday, 2 December 2018
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Love it! 😊❤️
ReplyDeleteThank you so much
DeleteAwsome
ReplyDeleteमैं तुमसे बेहतर लिखता हूँ ,
Deleteपर जज्बात तुम्हारे अच्छे हैं !
मैं तुमसे बेहतर दिखता हूँ ,
पर अदा तुम्हारी अच्छी हैं !
मैं खुश हरदम रहता हूँ ,
पर मुस्कान तुम्हारी अच्छी हैं !
मैं अपने उसूलों पर चलता हूँ ,
पर ज़िद तुम्हारी अच्छी हैं !
मैं एक बेहतर शख्सियत हूँ ,
पर सीरत तुम्हारी अच्छी हैं !
मैं आसमान की चाह रखता हूँ,
पर उड़ानें तुम्हारी अच्छी हैं !
मैं तुमसे बहुत बहस करता हूँ ,
पर दलीलें तुम्हारी अच्छी हैं !
मैं तुमसे बेहतर गाता हूँ ,
पर धुन तुम्हारी अच्छी हैं !
मैं कितना भी कुछ कहता रहूँ ,
पर हर बात तुम्हारी अच्छी हैं !
मैं तुमसे बेहतर लिखता हूँ ,
Deleteपर जज्बात तुम्हारे अच्छे हैं !
मैं तुमसे बेहतर दिखता हूँ ,
पर अदा तुम्हारी अच्छी हैं !
मैं खुश हरदम रहता हूँ ,
पर मुस्कान तुम्हारी अच्छी हैं !
मैं अपने उसूलों पर चलता हूँ ,
पर ज़िद तुम्हारी अच्छी हैं !
मैं एक बेहतर शख्सियत हूँ ,
पर सीरत तुम्हारी अच्छी हैं !
मैं आसमान की चाह रखता हूँ,
पर उड़ानें तुम्हारी अच्छी हैं !
मैं तुमसे बहुत बहस करता हूँ ,
पर दलीलें तुम्हारी अच्छी हैं !
मैं तुमसे बेहतर गाता हूँ ,
पर धुन तुम्हारी अच्छी हैं !
मैं कितना भी कुछ कहता रहूँ ,
पर हर बात तुम्हारी अच्छी हैं !
Thank you dear
DeleteBahut badhiya
ReplyDeleteसत्य कहा इंदु दीदी आपने जमाने के साथ धीरे धीरे चलना ही पड़ता है
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